अब स्कूलों में पढ़ेंगे श्यामा प्रसाद मुखर्जी का इतिहास, 2027 से लागू होगा फैसला

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पश्चिम बंगाल सरकार ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर बड़ा फैसला लिया है। अगले शैक्षणिक सत्र से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में उनकी जीवन-गाथा और योगदान पढ़ाया जाएगा।

पश्चिम बंगाल में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कहा है कि अगले शैक्षणिक सत्र से राज्य के पाठ्यक्रम में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और योगदान से जुड़े अध्याय शामिल किए जाएंगे। यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य में इतिहास और बंगाल की पहचान को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। सरकार का कहना है कि विद्यार्थियों को राज्य और देश के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के योगदान के बारे में जानकारी मिलनी चाहिए।

स्कूल से यूनिवर्सिटी तक इतिहास पर फोकस

इससे पहले भी पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से स्वतंत्रता सेनानियों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की जीवनियां अलग-अलग स्तरों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात कही गई थी। प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक इतिहास से जुड़े विषयों को नए तरीके से प्रस्तुत करने की योजना पर काम चल रहा है। इसी व्यापक बदलाव के बीच श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पाठ्यक्रम में जगह देने का फैसला सामने आया है। राज्य में पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप बदलने की प्रक्रिया भी चल रही है।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी क्यों हैं अहम?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति के प्रमुख नेताओं में रहे हैं और भारतीय जनसंघ के संस्थापक के रूप में उनकी महत्वपूर्ण पहचान है। बंगाल के राजनीतिक इतिहास में भी उनका खास स्थान माना जाता है। बीजेपी लंबे समय से उन्हें राष्ट्रीय एकता, अखंडता और बंगाल के निर्माण से जुड़े महत्वपूर्ण नेता के तौर पर प्रस्तुत करती रही है। अब उनकी राजनीतिक और ऐतिहासिक भूमिका को स्कूल की किताबों में शामिल करने से नई पीढ़ी को उनके विचारों और योगदान के बारे में पढ़ने का मौका मिलेगा।

फैसले के पीछे सियासी संदेश भी?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को सिलेबस में शामिल करने का फैसला सिर्फ शिक्षा से जुड़ा विषय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका राजनीतिक महत्व भी है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी लंबे समय से राज्य के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान को लेकर अपनी अलग राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश करती रही है। सरकार की ओर से पहले भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को प्रमुखता देने वाले फैसले सामने आए हैं। ऐसे में स्कूल की किताबों में उनका योगदान शामिल करना बंगाल की नई राजनीतिक दिशा का संकेत भी माना जा रहा है।

अब किताबों में कैसे पेश किया जाएगा इतिहास?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि पाठ्यक्रम में श्यामा प्रसाद मुखर्जी से जुड़े किन घटनाक्रमों और योगदान को शामिल किया जाएगा और उन्हें किस दृष्टिकोण से विद्यार्थियों के सामने रखा जाएगा। सरकार की ओर से अभी पाठ्यक्रम के अध्यायों की पूरी रूपरेखा सार्वजनिक नहीं की गई है। इतना स्पष्ट है कि 2027 से बंगाल के विद्यार्थियों को श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और योगदान से जुड़े विषय पढ़ाए जाने की योजना है। आने वाले समय में नए सिलेबस और अध्यायों की विस्तृत जानकारी सामने आने की उम्मीद है

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