गाजियाबाद में 4 देशों के फर्जी दूतावास चलाने वाले को मिली जमानत, पुलिस नहीं पेश कर सकी ठोस सबूत

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गाजियाबाद में फर्जी दूतावास चलाने के आरोपी हर्षवर्धन जैन को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत दे दी। कोर्ट ने जांच पूरी होने और चार्जशीट दाखिल होने को आधार बनाया। मामले में पहले एसटीएफ छापे में कई फर्जी दस्तावेज और नकदी बरामद हुई थी।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से जुड़े चर्चित फर्जी दूतावास मामले में बड़ा मोड़ आया है। आरोपी हर्षवर्धन जैन को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। अदालत के इस फैसले ने एक बार फिर पूरे मामले को सुर्खियों में ला दिया है। जहां एक ओर जांच एजेंसियों ने इसे बड़ा फर्जीवाड़ा बताया था, वहीं अब जमानत मिलने के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं। यह मामला इसलिए भी खास है क्योंकि आरोपी खुद को कई तथाकथित देशों का कॉन्सुल बताकर लोगों को प्रभावित करता था और आलीशान जिंदगी जी रहा था।


सरकार ने किया विरोध, बचाव पक्ष ने दी अलग दलील

जमानत सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से इसका कड़ा विरोध किया गया। सरकारी वकील ने अदालत में कहा कि जांच में आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत मिले हैं, जो उसकी भूमिका को साफ तौर पर साबित करते हैं। वहीं बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी के पास मिले पासपोर्ट और नंबर प्लेट केवल दिखावे के लिए थे और उनका इस्तेमाल किसी सरकारी पहचान के रूप में नहीं हुआ। साथ ही यह भी कहा गया कि आरोपी के खिलाफ किसी ने धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज नहीं कराई है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले की परिस्थितियों पर विचार किया।


चार्जशीट दाखिल, इसलिए मिली राहत—कोर्ट का तर्क

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, ऐसे में आरोपी को लंबे समय तक जेल में रखना उचित नहीं है। इसी आधार पर जमानत मंजूर कर ली गई। यह फैसला केस के ट्रायल से पहले एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। अब आगे की सुनवाई में यह तय होगा कि आरोपी पर लगे आरोप कितने मजबूत साबित होते हैं और कानून किस दिशा में आगे बढ़ता है।


छापेमारी में चौंकाने वाला खुलासा, करोड़ों का नेटवर्क सामने आया

गौरतलब है कि जुलाई 2025 में एसटीएफ ने कविनगर इलाके में छापा मारकर हर्षवर्धन जैन को गिरफ्तार किया था। उसके पास से लग्जरी गाड़ियां, लाखों की नकदी, विदेशी मुद्रा, कई देशों की मुहरें और फर्जी दस्तावेज बरामद किए गए थे। जांच में यह भी सामने आया कि वह ‘वेस्ट आर्कटिक दूतावास’ नाम से अवैध रूप से काम कर रहा था और खुद को कई काल्पनिक देशों का राजनयिक बताता था। इस पूरे मामले ने उस समय प्रशासन और आम लोगों दोनों को चौंका दिया था।

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