लोकसभा में मोदी सरकार को तगड़ा झटका, महिला आरक्षण बिल गिरा, 12 साल में पहली बार बिल पास नहीं करा पाई सरकार

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लोकसभा में महिला आरक्षण बिल दो-तिहाई बहुमत न मिलने से गिर गया। सरकार को 298 वोट मिले, जबकि 230 विरोध में पड़े। परिसीमन और जनगणना को लेकर विवाद बड़ा कारण रहा। विपक्ष की एकजुट रणनीति और संख्या बल की कमी से बिल पास नहीं हो सका।

नई दिल्ली में शुक्रवार का दिन संसदीय इतिहास के लिए बेहद अहम रहा, जब महिला आरक्षण बिल (131वां संविधान संशोधन) लोकसभा में पास नहीं हो सका। सरकार इस बिल को लेकर काफी आत्मविश्वास में थी, लेकिन वोटिंग के समय जरूरी आंकड़ा पूरा नहीं कर पाई। सदन में बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण यह बिल गिर गया। यह पिछले 12 वर्षों में पहला मौका है जब केंद्र सरकार का कोई संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास नहीं हो पाया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि बड़े संवैधानिक बदलावों के लिए सिर्फ संख्या बल ही नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक सहमति भी जरूरी होती है।


लोकसभा में क्यों गिरा संविधान संशोधन विधेयक? 5 प्रमुख कारण
इस बिल के गिरने के पीछे कई अहम कारण सामने आए हैं। सबसे बड़ा कारण दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा न छू पाना रहा। वोटिंग के समय 528 सदस्य मौजूद थे, जिसके हिसाब से कम से कम 352 वोट जरूरी थे, लेकिन सरकार को केवल 298 वोट ही मिले। इसके अलावा विपक्ष ने इस बिल को परिसीमन और जनगणना से जोड़ने का विरोध किया। दक्षिण भारतीय राज्यों को अपने प्रतिनिधित्व में कमी का डर भी था। विपक्ष ने मजबूत रणनीति के साथ एकजुट होकर सरकार को घेरा। वहीं सरकार का संख्या बल पर ज्यादा भरोसा भी भारी पड़ा, जिससे अंत में बिल पास नहीं हो सका।


परिसीमन और जनगणना पर विवाद बना सबसे बड़ा मुद्दा
इस बिल को लेकर सबसे ज्यादा विवाद परिसीमन और जनगणना की शर्त को लेकर हुआ। विपक्ष का कहना था कि सरकार आरक्षण को तुरंत लागू करने के बजाय इसे भविष्य की प्रक्रिया से जोड़ रही है। उनका आरोप था कि यह कदम महिलाओं को तुरंत लाभ देने के बजाय राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। विपक्ष चाहता था कि मौजूदा सीटों पर ही आरक्षण लागू किया जाए, ताकि महिलाओं को जल्द प्रतिनिधित्व मिल सके। इसी मुद्दे ने पूरे बहस को गरमा दिया और अंततः यह बिल के खिलाफ माहौल बनाने में अहम साबित हुआ।


दक्षिण राज्यों में प्रतिनिधित्व घटने का डर
दक्षिण भारत के कई राज्यों ने इस बिल को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी। उनका मानना था कि परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ने से उत्तर भारत की सीटें ज्यादा हो जाएंगी और उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है। इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन नई व्यवस्था में उन्हें नुकसान होने का डर था। इसी वजह से कई क्षेत्रीय दल इस बिल के खिलाफ खड़े हो गए और विपक्ष को मजबूती मिली।


विपक्ष की एकजुट रणनीति ने बदला खेल
इस बार विपक्ष ने बेहद सटीक रणनीति के साथ सरकार को चुनौती दी। मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के बीच तालमेल साफ दिखा। सभी दलों ने एक सुर में इस बिल का विरोध किया और इसे चुनावी नक्शा बदलने की साजिश बताया। इस एकजुटता ने सरकार की रणनीति को कमजोर कर दिया और वोटिंग में उसका गणित बिगड़ गया।


सरकार की रणनीति और नंबर गेम पड़ा भारी
सरकार को उम्मीद थी कि वह छोटे दलों और कुछ निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटा लेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आखिरी समय में कई दलों ने अपना रुख साफ कर दिया और सरकार जरूरी समर्थन नहीं जुटा पाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अपीलों का भी ज्यादा असर नहीं हुआ। यही वजह रही कि सरकार 360 के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी और बिल गिर गया।


महिला आरक्षण पर राजनीति तेज, दोनों पक्ष आमने-सामने
बिल गिरने के बाद सियासत और गरमा गई है। सरकार ने विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया, जबकि विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने कहा कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक फायदा उठाना चाहती थी। वहीं सरकार का कहना है कि वह महिलाओं को मजबूत प्रतिनिधित्व देना चाहती थी, लेकिन विपक्ष ने इसमें बाधा डाली।


अब आगे क्या होगा?
इस बिल के गिरने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि महिला आरक्षण का मुद्दा आगे कैसे बढ़ेगा। चूंकि यह संविधान संशोधन से जुड़ा मामला है, इसलिए सरकार को दोबारा इसे पेश करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी। साथ ही विपक्ष के साथ सहमति बनाना भी जरूरी होगा। फिलहाल यह साफ है कि बिना व्यापक समर्थन के इस तरह के बड़े बदलाव संभव नहीं हैं और आने वाले समय में इस मुद्दे पर फिर से राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है।

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