सरकारी शिक्षक की नौकरी छोड़ कैंसर पीड़ित बच्चों की सेवा में जुटीं सुरुचि शर्मा

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जम्मू की शिक्षिका सुरुचि शर्मा ने कैंसर पीड़ित बच्चों की मदद के लिए सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला लिया। अब वह इलाज, दवाओं और परिवारों को भावनात्मक सहारा देने के काम में जुटी हैं।

जम्मू की शिक्षिका सुरुचि शर्मा ने कैंसर पीड़ित बच्चों की मदद के लिए सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला लिया। अब वह इलाज, दवाओं और परिवारों को भावनात्मक सहारा देने के काम में जुटी हैं।


सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला, जिसने बदल दी बच्चों की जिंदगी

कहते हैं कि समाज में बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े पद या बड़ी ताकत की जरूरत नहीं होती, बल्कि एक मजबूत इरादा ही काफी होता है। जम्मू-कश्मीर के जम्मू में रहने वाली सुरुचि शर्मा ने अपने काम से इस बात को साबित किया है। उन्होंने कैंसर से जूझ रहे बच्चों की मदद के लिए ऐसा रास्ता चुना, जिसने कई परिवारों को नई उम्मीद दी। जम्मू विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाली सुरुचि साल 2016 में गैर-सरकारी संगठन कैनकिड्स किड्सकैन से जुड़ी थीं। इसके बाद उन्होंने जम्मू के श्री महाराजा गुलाब सिंह अस्पताल में कैंसर पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों की मदद करना शुरू किया। कुछ ही समय में इन बच्चों के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता इतना गहरा हो गया कि साल 2018 में जब उन्हें सरकारी शिक्षिका की नौकरी मिली, तब उन्होंने नौकरी करने के बजाय बच्चों की सेवा जारी रखने का फैसला किया। यह सिर्फ एक पेशे को चुनने या छोड़ने का मामला नहीं था, बल्कि उन परिवारों के साथ खड़े रहने का संकल्प था, जो अपने बच्चों की बीमारी के बीच आर्थिक और मानसिक चुनौतियों से जूझ रहे थे।

इलाज से लेकर काउंसलिंग तक, हर मोर्चे पर बच्चों का सहारा

सुरुचि शर्मा का काम केवल अस्पताल में बच्चों की मदद करने तक सीमित नहीं है। वह जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त जांच और दवाइयां उपलब्ध कराने में सहयोग करती हैं और यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश करती हैं कि आर्थिक परेशानियों के कारण बच्चों का इलाज बीच में न छूटे। इसके लिए मरीजों का रिकॉर्ड व्यवस्थित रखना, परिवारों से लगातार संपर्क बनाए रखना और समय पर फॉलोअप करना उनकी जिम्मेदारियों में शामिल है। कई परिवार इलाज के खर्च के साथ अस्पताल तक आने-जाने की परेशानी भी नहीं उठा पाते। ऐसे में उन्हें परिवहन खर्च की सहायता दिलाने में भी मदद की जाती है। इसके अलावा सुरुचि बच्चों और उनके परिजनों को व्यक्तिगत तथा ऑनलाइन काउंसलिंग के जरिए भावनात्मक सहारा देती हैं। आयुष्मान भारत योजना के तहत पंजीकरण, शिक्षा संबंधी मदद और जरूरी दस्तावेज तैयार कराने में मार्गदर्शन भी उनके काम का हिस्सा है। जरूरत पड़ने पर स्थानीय संगठनों के सहयोग से रक्त और प्लेटलेट्स की व्यवस्था कराने तथा कैंसर के उपचार को लेकर जागरूकता फैलाने में भी उनकी अहम भूमिका रहती है।

इलाज छोड़ने की दर में गिरावट, 100 से ज्यादा बच्चों ने दी कैंसर को मात

सुरुचि शर्मा के प्रयासों से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा कैंसर का इलाज बीच में छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या में आई कमी है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2014 से पहले जम्मू में बच्चों के बीच कैंसर का इलाज अधूरा छोड़ने की दर 24 प्रतिशत थी, जो अब घटकर एक प्रतिशत से भी कम रह गई है। नियमित फॉलोअप, परिवारों की समस्याओं को समझने और जरूरत के समय सहायता उपलब्ध कराने जैसे प्रयास इस बदलाव से जुड़े बताए गए हैं। सुरुचि के अनुसार, डॉक्टरों के महत्वपूर्ण योगदान के साथ अब तक 100 से अधिक बच्चे कैंसर को मात देकर स्वस्थ हो चुके हैं, जिनमें ज्यादातर ब्लड कैंसर से पीड़ित थे। शुरुआती दौर में संसाधन जुटाना बड़ी चुनौती था, लेकिन परिवार के सहयोग और लगातार प्रयासों ने उनके हौसले को मजबूत बनाए रखा। सुरुचि शर्मा की कहानी बताती है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चों के लिए इलाज के साथ भावनात्मक सहारा और निरंतर मदद भी कितनी अहम है।

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