SIR पूरा होने के बाद भी मतदाता सूची में सुधार जारी, सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ की

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR पूरा हो जाने का मतलब मतदाता सूची का स्थायी रूप से बंद हो जाना नहीं है। नाम जोड़ने, हटाने और सुधार से जुड़े वैधानिक आवेदन आगे भी दिए जा सकते हैं।

नई दिल्ली। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मतदाता सूची को लेकर बनी उलझन पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ कर दी है। अदालत ने कहा कि पुनरीक्षण पूरा हो जाना इस बात का संकेत नहीं है कि मतदाता सूची अब पूरी तरह स्थिर या अपरिवर्तनीय हो गई। पात्र नागरिकों के नाम जोड़ने, गलतियां दुरुस्त कराने और कानून के तहत आपत्तियां दर्ज कराने का रास्ता खुला रहेगा। यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आई, जिनमें मतदाता सूची से नाम हटाने और फॉर्म-7 के कथित थोक इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए थे। मामले का सीधा असर उन लाखों मतदाताओं पर पड़ता है, जिन्हें अंतिम सूची में नाम न मिलने या विवरण में गलती की शिकायत है।


सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगी कार्रवाई

उत्तर प्रदेश में SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के बड़े पैमाने पर जमा किए जाने के आरोपों पर भी शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को जांच के निर्देश दिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से दावा किया गया कि एक विधानसभा क्षेत्र में एक खास समुदाय के लोगों के खिलाफ 32 फॉर्म जमा किए गए। अदालत ने शिकायतों और कथित अनियमितताओं का ब्योरा चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिवक्ता को देने को कहा है। आयोग को तथ्यात्मक जांच कर जरूरी सुधार करने और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया। फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी नाम को मतदाता सूची से हटाने या प्रस्तावित नाम पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए होता है। अदालत के रुख से साफ है कि प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद शिकायतों की जांच का अधिकार और प्रशासनिक जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।


मतदाता सूची में सुधार का कानूनी रास्ता खुला

सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि SIR की अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद क्या मतदाता नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया रुक जाएगी। अदालत ने साफ किया कि ऐसा नहीं है। चुनावी कानूनों के तहत मतदाता पंजीकरण अधिकारी दावों और आपत्तियों पर फैसला ले सकते हैं। नाम शामिल कराने के लिए फॉर्म-6 और नाम हटाने या आपत्ति के लिए फॉर्म-7 का प्रावधान जारी रहता है। निर्वाचन अधिकारी को आवेदन पर नियमानुसार सुनवाई करनी होगी और फैसला रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा। चुनाव आयोग पहले भी अदालत में कह चुका है कि SIR वैधानिक प्रक्रिया के तहत कराया गया है और अंतिम निर्णय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों का ही होता है। यानी पुनरीक्षण सूची को अद्यतन करने की नियमित व्यवस्था SIR के बाद भी चलती रहेगी।


आगे मतदाताओं और राजनीतिक दलों की नजर

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद अब जिला निर्वाचन कार्यालयों पर शिकायतों के निस्तारण का दबाव बढ़ेगा। जिन मतदाताओं का नाम अंतिम सूची में नहीं है, उन्हें दस्तावेजों के साथ निर्धारित प्रक्रिया में आवेदन करना होगा। राजनीतिक दल भी बूथ स्तर पर सूचियों की जांच कर आपत्तियां दर्ज कराने की तैयारी में हैं। विपक्ष ने SIR के दौरान नाम कटने और कथित पक्षपात के आरोप लगाए हैं, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि प्रक्रिया का उद्देश्य सूची को अधिक सटीक बनाना है। अदालत ने फिलहाल किसी आरोप को अंतिम रूप से सही नहीं माना, लेकिन शिकायतों की जांच और सुधार को जरूरी बताया है। अब आयोग की रिपोर्ट और निर्वाचन अधिकारियों के फैसलों से तय होगा कि विवादित नामों और फॉर्म-7 आवेदनों पर क्या कार्रवाई होती है।

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