मेरठ में फर्जी जनसेवा केंद्र का पर्दाफाश, बाप-बेटा गिरफ्तार; तीसरे आरोपी की तलाश में जुटी पुलिस

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मेरठ में साइबर सेल और लिसाड़ी गेट पुलिस ने फर्जी जनसेवा केंद्र चलाने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने पिता-पुत्र को गिरफ्तार किया है, जबकि एक तीसरे आरोपी की तलाश जारी है।

मेरठ। साइबर ठगी के नए-नए तरीके सामने आ रहे हैं, और मेरठ में पुलिस ने एक ऐसे ही फर्जी जनसेवा केंद्र का भंडाफोड़ किया है जो कागजों पर सेवा केंद्र था, लेकिन हकीकत में साइबर अपराध का अड्डा बन चुका था। साइबर सेल और लिसाड़ी गेट थाना पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि तीसरे साथी की तलाश तेज कर दी गई है। गिरफ्तार किए गए आरोपी पिता-पुत्र बताए जा रहे हैं। जांच में खुलासा हुआ कि यह गिरोह लोगों के नाम पर बैंक खाते खुलवाने और ऑनलाइन धोखाधड़ी से जुड़े कामों में लिप्त था। पुलिस को मौके से आधार, डेबिट और अन्य बैंकिंग दस्तावेजों का बड़ा जखीरा भी मिला है।

पुलिस की छापेमारी में खुला जाल

जानकारी के मुताबिक, पुलिस को लंबे समय से इस केंद्र की गतिविधियों पर शक था। दस्तावेजों की जांच और स्थानीय इनपुट के आधार पर जब टीम ने दबिश दी तो वहां से ऐसा सामान मिला जिसने पूरे नेटवर्क की परतें खोल दीं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, केंद्र की आड़ में ऐसे कागजात तैयार किए जा रहे थे जिनका इस्तेमाल अलग-अलग नामों से बैंक खाते खुलवाने में किया जाता था। इसके बाद इन खातों को ऑनलाइन फ्रॉड के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका सामने आई है। पूछताछ में यह भी सामने आया है कि आरोपियों ने जनसेवा केंद्र की आड़ में लोगों का भरोसा जीतकर यह खेल चलाया।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, बरामद दस्तावेजों में आधार कार्ड, डेबिट कार्ड और बैंक से जुड़े कागजात शामिल हैं। शुरुआती जांच बताती है कि यह काम एक दिन या एक महीने का नहीं था, बल्कि काफी समय से संगठित तरीके से चल रहा था। यही वजह है कि पुलिस अब इन खातों के ट्रांजेक्शन, मोबाइल नंबरों और संदिग्ध लेन-देन की कड़ी जोड़ रही है। अधिकारियों का मानना है कि गिरोह के तार सिर्फ मेरठ तक सीमित नहीं, बल्कि दूसरे जिलों और राज्यों में भी जा सकते हैं। इसी वजह से तीसरे आरोपी की भूमिका को भी बेहद अहम माना जा रहा है।

जनसेवा केंद्र की आड़ में साइबर नेटवर्क

पिछले कुछ समय में जनसेवा केंद्रों और छोटे डिजिटल सेवा बिंदुओं का दुरुपयोग बढ़ा है। कई जगह ऐसे केंद्र आम लोगों को सरकारी सेवाओं से जोड़ने के लिए बने, लेकिन कुछ गिरोह इन्हीं की आड़ में फर्जी पहचान, सिम, बैंक खाता और दस्तावेज तैयार करने का धंधा चला रहे हैं। मेरठ का यह मामला भी उसी बड़े पैटर्न का हिस्सा माना जा रहा है। पुलिस की नजर में यह सिर्फ एक स्थानीय अपराध नहीं, बल्कि साइबर ठगी के उस ढांचे का हिस्सा है जिसमें फर्जी दस्तावेज, म्यूल अकाउंट और डिजिटल लेन-देन का इस्तेमाल होता है।

अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती असली और फर्जी दस्तावेजों के बीच की पतली रेखा होती है। जनसेवा केंद्र की वैध पहचान का सहारा लेकर आरोपी लोगों को आसानी से भरोसे में लेते रहे होंगे, इसलिए जांच अब केवल गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहेगी। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि किन-किन लोगों के नाम पर खाते खोले गए, किन मोबाइल नंबरों से लिंक किए गए और किन लेन-देन में उनका इस्तेमाल हुआ। माना जा रहा है कि पूछताछ आगे बढ़ने पर और नाम सामने आ सकते हैं, जिससे इस पूरे नेटवर्क का दायरा साफ होगा।

आगे की जांच में खुल सकते हैं और नाम

फिलहाल पुलिस ने बरामद दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है। गिरफ्तार पिता-पुत्र से पूछताछ के बाद तीसरे आरोपी की तलाश में दबिशें दी जा रही हैं। साइबर सेल की टीम यह भी देख रही है कि क्या इसी केंद्र के जरिए अन्य लोगों की पहचान का दुरुपयोग हुआ है। अगर ऐसा साबित होता है, तो पीड़ितों की संख्या बढ़ सकती है। स्थानीय स्तर पर इस कार्रवाई को बड़ी सफलता माना जा रहा है, क्योंकि इससे उन नेटवर्कों पर भी दबाव बढ़ेगा जो छोटे-छोटे सेवा केंद्रों को ढाल बनाकर साइबर अपराध को हवा दे रहे हैं।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल सेवाओं के नाम पर चलने वाले केंद्रों की निगरानी अब और सख्त करनी होगी, क्योंकि ठगी के तरीके बदल चुके हैं और अपराधी अब सीधे बाजार या इंटरनेट कैफे की बजाय भरोसे वाले ढांचों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरठ की यह कार्रवाई उसी चेतावनी की तरह देखी जा रही है। जांच में जो भी नया तथ्य सामने आएगा, उसके आधार पर आगे की धाराएं और आरोपियों की भूमिका तय की जाएगी। फिलहाल शहर में इस खुलासे को लेकर चर्चा तेज है और लोग जानना चाह रहे हैं कि आखिर कितने समय से यह फर्जीवाड़ा पर्दे के पीछे चलता रहा।

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