विवादों में उलझी सनी देओल की फिल्म बॉर्डर, लोंगेवाला युद्ध में शामिल हवलदार बोले- सिर्फ तीन जवान शहीद, फिल्म में सभी को बता दिया

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लोंगेवाला युद्ध में शामिल पूर्व सैनिक ने ‘बॉर्डर’ फिल्म में युद्ध के गलत चित्रण का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वास्तविक लड़ाई में सीमित सैनिकों ने साहसिक मुकाबला किया, पर फिल्म में लगभग सभी को शहीद दिखाया गया, जिससे असली वीरता की कहानी दब गई।

हाल में रिलीज हुई फिल्म बॉर्डर 2 की चर्चा के बीच 1997 की सुपरहिट फिल्म बॉर्डर को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। लोंगेवाला की लड़ाई में शामिल रहे पूर्व सैनिक मुख्तियार सिंह ने दावा किया है कि फिल्म में युद्ध के वास्तविक घटनाक्रम को गलत ढंग से दिखाया गया। उनका कहना है कि वास्तविक संघर्ष में भारतीय सैनिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी पाकिस्तानी टैंक और सेना टुकड़ी का मुकाबला किया, लेकिन फिल्म में लगभग सभी सैनिकों को शहीद दिखा दिया गया, जिससे असली योद्धाओं की कहानी पीछे छूट गई।


पूर्व सैनिक का दावा, इतिहास को सही रूप में दिखाया जाए
मुख्तियार सिंह, जो अब 81 वर्ष के हैं, बताते हैं कि 1971 के युद्ध के दौरान वे जवान के रूप में मोर्चे पर तैनात थे। उनके अनुसार, उस समय मोर्चे पर करीब 120 भारतीय सैनिक मौजूद थे और उन्होंने दुश्मन के टैंकों की भारी संख्या का डटकर मुकाबला किया। उनका कहना है कि असली संघर्ष में केवल तीन जवानों की जान गई थी, जबकि फिल्म में पूरी टुकड़ी को शहीद दिखाया गया। सिंह का कहना है कि यह चित्रण आने वाली पीढ़ियों को गलत इतिहास बताता है। वे चाहते हैं कि युद्ध की वास्तविक कहानी सामने लाई जाए ताकि लोगों को असली वीरता का पता चल सके।


सरकार और फिल्म कलाकारों से मान्यता की मांग
पूर्व सैनिक ने बताया कि वे पिछले दो वर्षों से इस मामले में पत्र लिखकर संबंधित अधिकारियों को अवगत करा रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें किसी पुरस्कार या लाभ की इच्छा नहीं, बल्कि युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों को उचित सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता सनी देओल यदि चाहें तो उन जीवित सैनिकों से मिल सकते हैं, जिन्होंने वास्तव में मोर्चे पर लड़ाई लड़ी थी। सिंह का मानना है कि यह मुलाकात नई पीढ़ी को सही इतिहास समझाने में मददगार होगी।


1971 युद्ध की यादें आज भी ताजा
पूर्व सैनिक बताते हैं कि उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और पूरे देश में युद्ध की स्थिति बनी हुई थी। उनके अनुसार, सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय सेना ने अद्भुत साहस दिखाया और दुश्मन की आगे बढ़ती टुकड़ी को रोक दिया। वे कहते हैं कि युद्ध में लड़ने वाले कई सैनिक आज जीवित नहीं बचे, इसलिए जरूरी है कि उनकी बहादुरी को सही तरीके से दर्ज किया जाए, ताकि देश की आने वाली पीढ़ियां अपने असली नायकों को जान सकें।

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