एनकाउंटर के पीछे क्या है सच? करीना और पृथ्वीराज की ‘दायरा’ हर कदम पर खड़े करती है नए सवाल
- Shiv Kumar
- 18 Sep, 2026
कुछ फिल्में अपनी कहानी की वजह से याद रह जाती हैं, कुछ अपने कलाकारों के दम पर और कुछ ऐसी होती हैं, जिनके निर्देशक का नाम ही दर्शकों की उम्मीद बढ़ा देता है। मेघना गुलजार की ‘दायरा’ भी इसी श्रेणी की फिल्म है। ‘राजी’ और ‘सैम बहादुर’ जैसी फिल्मों के बाद मेघना ने वास्तविक घटनाओं और गंभीर विषयों को संवेदनशील तरीके से पर्दे पर रखने वाली फिल्मकार के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। ‘दायरा’ भी एक ऐसे ही संवेदनशील और असहज मुद्दे को सामने रखती है। फिल्म में करीना कपूर खान एक जांच अधिकारी की भूमिका में हैं, जबकि पृथ्वीराज सुकुमारन विवादित एनकाउंटर के केंद्र में मौजूद पुलिस अधिकारी का किरदार निभा रहे हैं। फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह दर्शकों को किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होने के लिए मजबूर नहीं करती। कहानी लगातार सवाल उठाती है कि न्याय आखिर किसे कहा जाए और कानून की सीमा कहां तक होनी चाहिए।
क्या है ‘दायरा’ की कहानी?
फिल्म की कहानी डीसीपी रमन कुमार से शुरू होती है, जिसका किरदार पृथ्वीराज सुकुमारन ने निभाया है। रमन की टीम ने चार ऐसे लोगों को एनकाउंटर में मार गिराया है, जिन पर 24 साल की रागिनी पुजारी के साथ मारपीट और दुष्कर्म करने के बाद उसे जलाकर उसके अवशेष दिल्ली हाईवे के पास छोड़ने का आरोप था। आम लोगों की नजर में यह कार्रवाई न्याय मिलने जैसी दिखाई देती है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या चारों आरोपियों को वास्तव में मुठभेड़ में मारा गया या पूरा ऑपरेशन पहले से तय था? इसी सवाल की जांच की जिम्मेदारी डीसीपी अजूनी कोहली को दी जाती है। करीना कपूर खान ने अजूनी की भूमिका निभाई है। वह इंटरनल विजिलेंस का हिस्सा हैं और अपनी टीम के साथ सूर्यापुर पहुंचकर पूरे मामले की कड़ियां जोड़ना शुरू करती हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ फिल्म रागिनी के साथ हुई घटना, एनकाउंटर तक पहुंची परिस्थितियों और पुलिस अधिकारियों की भूमिका को सामने लाती है। कहानी 2019 के हैदराबाद दुष्कर्म और हत्या मामले और उसके बाद हुए एनकाउंटर से समानताएं भी दिखाती है।
करीना और पृथ्वीराज की परफॉर्मेंस
करीना कपूर खान फिल्म की मजबूत कड़ियों में शामिल हैं। उनका अजूनी का किरदार किसी फिल्मी सुपरकॉप की तरह नहीं दिखाया गया है। न कोई लंबा भाषण है और न ही जरूरत से ज्यादा नाटकीय अंदाज। अजूनी शांत, सजग और अपने काम पर केंद्रित अधिकारी हैं। करीना ने इस किरदार में संयम बनाए रखा है और चेहरे के भावों के जरिए तनाव को महसूस कराया है। हालांकि उनके किरदार को थोड़ा और विस्तार मिलता तो कहानी का यह हिस्सा और प्रभावी हो सकता था। पृथ्वीराज सुकुमारन ने रमन कुमार के किरदार में अलग तरह की ऊर्जा दिखाई है। रमन का मानना है कि व्यवस्था रागिनी को न्याय नहीं दिला सकी और ऐसे मामलों में पुलिस को सख्त कदम उठाने पड़ते हैं। फिल्म उसे पूरी तरह सही साबित नहीं करती और न ही एकतरफा खलनायक बनाती है। पृथ्वीराज इस नैतिक रूप से जटिल किरदार को मजबूती से निभाते हैं। जितेंद्र जोशी भी अपनी भूमिका में प्रभावी हैं। बिस्वपति सरकार सीमित स्क्रीन टाइम में अपनी छाप छोड़ते हैं। कंवलजीत सिंह अजूनी के पिता के किरदार में हैं, जबकि क्षिती जोग रागिनी की मां की भूमिका में नजर आती हैं। रागिनी की मां के किरदार में उनका दर्द बिना जरूरत के भावुक किए प्रभाव छोड़ता है।
मेघना गुलजार का निर्देशन कितना असरदार?
मेघना गुलजार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह दर्शकों को हर सवाल का तैयार जवाब नहीं देतीं। ‘दायरा’ में भी यही नजरिया दिखाई देता है। अजूनी और रमन के बीच वैचारिक टकराव फिल्म का अहम हिस्सा है। दोनों की सोच एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है और कहानी इसी टकराव के जरिए आगे बढ़ती है। एक तरफ कानून और प्रक्रिया है, तो दूसरी तरफ तत्काल न्याय की मांग और व्यवस्था पर अविश्वास।
फिल्म कई जगह दर्शक की बनाई हुई राय को बदलने की कोशिश करती है। जब लगता है कि मामला साफ है, तभी कहानी एक नया पहलू सामने रख देती है। यही वजह है कि फिल्म खत्म होने के बाद भी इसके सवाल दिमाग में बने रहते हैं। हालांकि यह मेघना गुलजार की पिछली फिल्मों जितना प्रभाव पैदा नहीं कर पाती। कुछ हिस्सों में कहानी की रफ्तार धीमी पड़ती है और कुछ किरदारों को अपेक्षित गहराई नहीं मिलती।
कहां मजबूत और कहां कमजोर है फिल्म?
‘दायरा’ की सबसे बड़ी ताकत इसका अभिनय और दो अलग नजरियों के बीच होने वाला टकराव है। करीना और पृथ्वीराज की स्क्रीन प्रेजेंस कहानी को मजबूती देती है। फिल्म आसान जवाब देने से भी बचती है। वह यह तय करने का फैसला दर्शक पर छोड़ देती है कि न्याय और कानून के बीच संतुलन किस तरह देखा जाना चाहिए। वहीं इसकी कमजोरी कुछ हिस्सों की धीमी गति और कुछ अधूरे लगने वाले किरदार हैं। खास तौर पर अजूनी का किरदार काफी संभावनाओं वाला है, लेकिन फिल्म उसके व्यक्तित्व और निजी पक्ष को ज्यादा विस्तार नहीं देती। जांच से जुड़े कुछ घटनाक्रम तक पहुंचने में भी कहानी जरूरत से ज्यादा समय लेती हुई महसूस होती है। इसके बावजूद फिल्म का तनाव बना रहता है और मेघना का गंभीर ट्रीटमेंट कहानी को लेक्चर में बदलने से बचाता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘दायरा’ सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं है। यह न्याय, कानून, पुलिस व्यवस्था और तत्काल न्याय की सोच के बीच खड़े सवालों को सामने रखती है। करीना कपूर खान ने अजूनी के किरदार में संयमित अभिनय किया है, जबकि पृथ्वीराज सुकुमारन रमन के जटिल नजरिए को मजबूती देते हैं। मेघना गुलजार की फिल्म आपको किसी एक निष्कर्ष तक पहुंचाने की जल्दबाजी नहीं करती। यही इसकी खासियत भी है। यह उनकी सबसे बेहतरीन फिल्म भले न हो, लेकिन गंभीर विषय और मजबूत अभिनय की वजह से ‘दायरा’ दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है और फिल्म खत्म होने के बाद भी इसके सवाल लंबे समय तक बने रहते हैं।
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