ब्लड शुगर बढ़ने के शुरुआती संकेतों को समझें, प्री-डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये जरूरी आदतें

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प्री-डायबिटीज में ब्लड शुगर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचता। इसके स्पष्ट लक्षण अक्सर दिखाई नहीं देते। HbA1c और अन्य ब्लड टेस्ट से इसकी पहचान की जा सकती है। समय रहते जांच और जीवनशैली में सुधार जोखिम कम करने में मदद कर सकते हैं।

बदलती जीवनशैली, खानपान की गलत आदतों और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। इस बीमारी से बचाव के लिए शुरुआती स्तर पर ही सतर्क रहना जरूरी है। खासतौर पर प्री-डायबिटीज की स्थिति में समय रहते जांच और जीवनशैली में सुधार करके टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है। प्री-डायबिटीज में खून में ग्लूकोज का स्तर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन अभी डायबिटीज की सीमा तक नहीं पहुंचता। इसे शरीर की ओर से मिलने वाला एक चेतावनी संकेत माना जाता है। हालांकि, केवल लक्षणों के आधार पर इसकी पहचान करना मुश्किल है, इसलिए जरूरत के अनुसार ब्लड शुगर की जांच कराना महत्वपूर्ण है।


प्री-डायबिटीज के शुरुआती लक्षण क्या हैं?

प्री-डायबिटीज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ज्यादातर लोगों में इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति खुद को सामान्य महसूस कर सकता है, जबकि उसका ब्लड शुगर स्तर बढ़ा हुआ हो। कुछ लोगों की गर्दन, बगल या शरीर के अन्य हिस्सों की त्वचा गहरी और मोटी होने लगती है। यह इंसुलिन रेजिस्टेंस का संकेत हो सकता है। इस स्थिति में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करतीं, जिससे ब्लड शुगर नियंत्रित करने में परेशानी हो सकती है। इसके अलावा, वजन बढ़ना और पेट के आसपास अधिक चर्बी जमा होना भी टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ा सकता है। बार-बार प्यास लगना, ज्यादा पेशाब आना और लगातार थकान महसूस होना भी बढ़े हुए ब्लड शुगर के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।


ब्लड टेस्ट से कैसे होती है प्री-डायबिटीज की पहचान?

प्री-डायबिटीज का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट सबसे अहम तरीका है। इसके लिए मुख्य रूप से HbA1c, फास्टिंग ब्लड शुगर और ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट किए जाते हैं। HbA1c टेस्ट पिछले लगभग दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर का अनुमान देता है। इसका स्तर 5.7 से 6.4 प्रतिशत होने पर प्री-डायबिटीज की श्रेणी मानी जाती है। फास्टिंग ब्लड शुगर टेस्ट में खाली पेट ग्लूकोज का स्तर 100 से 125 mg/dL होने पर भी प्री-डायबिटीज मानी जाती है। वहीं, ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट में ग्लूकोज पीने के दो घंटे बाद ब्लड शुगर 140 से 199 mg/dL के बीच होने पर यह स्थिति मानी जाती है। किस व्यक्ति को कौन-सा टेस्ट कराना चाहिए, इसका फैसला डॉक्टर उसकी स्थिति के अनुसार करते हैं।


खानपान और दिनचर्या में बदलाव क्यों जरूरी है?

प्री-डायबिटीज सामने आने पर खानपान और शारीरिक गतिविधियों में सुधार करना फायदेमंद हो सकता है। संतुलित भोजन लें और खाने में सब्जियों, फाइबर वाले खाद्य पदार्थों तथा उचित मात्रा में प्रोटीन को शामिल करें। मीठे पेय पदार्थों और अधिक चीनी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें। नियमित शारीरिक गतिविधि, जैसे तेज चाल से पैदल चलना, वजन नियंत्रित रखने और शरीर की इंसुलिन के प्रति प्रतिक्रिया बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। पर्याप्त नींद लेना और लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचना भी जरूरी है। हालांकि, हर व्यक्ति की जरूरत अलग होती है, इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और जीवनशैली में बदलाव करना बेहतर है। प्री-डायबिटीज का मतलब यह नहीं कि डायबिटीज होना तय है, लेकिन इसे नजरअंदाज करना जोखिम बढ़ा सकता है।

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