पुदीना और अजवाइन में मिला फेफड़ों के कैंसर से लड़ने का संकेत, शोध में सामने आए उम्मीद जगाने वाले नतीजे

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पुदीना और अजवाइन जैसे सामान्य मसालों में पाए जाने वाले क्वेरसेटिन पर हुए शोध ने फेफड़ों के कैंसर को लेकर नई उम्मीद जगाई है। प्रयोगशाला और पशु मॉडल में इस यौगिक ने कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि और फैलाव को धीमा किया, हालांकि मानव उपचार में इसके इस्तेमाल से पहले बड़े क्लिनिकल परीक्षण जरूरी हैं।

लखनऊ। रसोई में रोज इस्तेमाल होने वाला पुदीना और अजवाइन अब फेफड़ों के कैंसर पर चल रहे शोध के कारण चर्चा में है। वैज्ञानिकों ने इन पौधों में मौजूद क्वेरसेटिन नामक प्राकृतिक यौगिक के असर का प्रयोगशाला स्तर पर अध्ययन किया है। शुरुआती नतीजों में सामने आया कि यह यौगिक फेफड़ों की कैंसर कोशिकाओं के विभाजन को धीमा करने और उनके शरीर में फैलने की क्षमता रोकने में मदद कर सकता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, कोशिकाओं के प्रवास यानी मेटास्टेसिस की दिशा में जाने की प्रक्रिया पर इसका असर खास तौर पर देखा गया। हालांकि इसे कैंसर की दवा या घरेलू इलाज मान लेना जल्दबाजी होगी। विशेषज्ञों ने साफ किया है कि मानव मरीजों पर प्रभाव और सुरक्षित मात्रा तय करने के लिए आगे के परीक्षण जरूरी हैं।


क्वेरसेटिन ने कैंसर कोशिकाओं की चाल पर लगाई रोक

जानकारी के मुताबिक, शोध में क्वेरसेटिन को फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी कोशिकाओं, फेफड़ों के ऊतक नमूनों और पशु मॉडल पर परखा गया। प्रयोगों में अधिक मात्रा में क्वेरसेटिन दिए जाने पर कैंसर कोशिकाओं की गति और आपस में फैलने की क्षमता में कमी दर्ज की गई। वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि यौगिक ने EGFR जैसे विकास संकेतों से जुड़े प्रोटीन और PD-L1 के स्तर को प्रभावित किया। PD-L1 वह तंत्र है जिसका सहारा कुछ कैंसर कोशिकाएं शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से बचने के लिए लेती हैं। शोध दल का मानना है कि क्वेरसेटिन सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव से जुड़े रास्तों पर भी असर डाल सकता है। ये निष्कर्ष उत्साह बढ़ाने वाले हैं, लेकिन अभी इन्हें प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रमाण ही माना जाएगा।


रसोई की चीजों में मौजूद है प्राकृतिक यौगिक

क्वेरसेटिन कई पौधों में पाया जाने वाला फ्लेवोनॉयड है। पुदीना और अजवाइन के अलावा प्याज, खट्टे फलों, कुट्टू और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों में भी इसकी मौजूदगी बताई जाती है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसके सूजनरोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों का अध्ययन कर रहे हैं। नए शोध में यह संकेत मिला कि इसका असर केवल कैंसर कोशिकाओं तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि आंतों के उपयोगी बैक्टीरिया और उनसे बनने वाले कुछ फैटी एसिड के जरिए फेफड़ों के वातावरण पर भी पड़ सकता है। जर्मनी के शोधकर्ताओं की टीम ने बताया कि इस दिशा में अभी और काम चलना है। खासकर यह समझना जरूरी है कि भोजन से मिलने वाली मात्रा और प्रयोगशाला में इस्तेमाल की गई मात्रा में बड़ा अंतर हो सकता है।


इलाज का विकल्प नहीं, आगे के परीक्षण का इंतजार

कैंसर विशेषज्ञों के अनुसार, किसी खाद्य पदार्थ में मौजूद यौगिक का प्रयोगशाला में असर दिखना और मरीज के शरीर में वही परिणाम मिलना दो अलग बातें हैं। इसलिए मरीजों को डॉक्टर की सलाह के बिना कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी या निर्धारित दवाएं बंद नहीं करनी चाहिए। शोधकर्ताओं ने भी इसे फिलहाल संभावित सहायक उपाय के तौर पर देखा है, प्रमाणित उपचार के रूप में नहीं। आगे मानव परीक्षणों में इसकी प्रभावशीलता, दुष्प्रभाव, दवा के साथ संभावित प्रतिक्रिया और सही खुराक की जांच होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित आहार में पुदीना या अजवाइन शामिल करना सामान्य तौर पर अलग बात है, लेकिन इनके अर्क या सप्लीमेंट का सेवन बिना चिकित्सकीय सलाह जोखिम पैदा कर सकता है।

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