अमेरिका और ईरान के रिश्तों में बड़ा मोड़, डिजिटल साइन के बाद जेनेवा में होगी औपचारिक डील, 28 लाख करोड़ दे सकता है अमेरिका

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अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते को लेकर बड़ी प्रगति हुई है। दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनने का दावा किया गया है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद बढ़ी है।

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव के बीच एक बड़ी कूटनीतिक पहल सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच शांति समझौता लगभग पूरा हो चुका है और इस पर शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे। ट्रम्प के मुताबिक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे। इस घोषणा के बाद पूरी दुनिया की नजरें इस समझौते पर टिक गई हैं, क्योंकि वर्षों से परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। हालांकि समझौते का पूरा मसौदा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन इसे पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


समझौते की शर्तों और परमाणु कार्यक्रम पर बनी सहमति

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच 14 बिंदुओं वाला प्रारंभिक मसौदा तैयार किया गया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान को किसी भी प्रकार की आर्थिक राहत तभी मिलेगी जब वह समझौते की सभी शर्तों का पूरी तरह पालन करेगा। दूसरी ओर ईरान ने इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता बताया है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा कि यह समझौता देश के लिए गर्व का विषय बन सकता है। समझौते के तहत अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के निरीक्षकों को फिर से ईरान में काम करने की अनुमति दिए जाने की बात भी सामने आई है। इसका उद्देश्य ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि उसका उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हो। फ्रांस समेत कई देशों ने भी यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रखने की मांग का समर्थन किया है।


इजराइल की नाराजगी और दुनिया की प्रतिक्रिया

जहां एक ओर कई देशों ने इस समझौते का स्वागत किया है, वहीं इजराइल ने इससे दूरी बना ली है। इजराइल के नेताओं ने साफ कहा है कि यह अमेरिका का फैसला है और उनका देश इससे बंधा हुआ नहीं है। इजराइल का मानना है कि ईरान पर दबाव बनाए रखना जरूरी है। दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, पाकिस्तान और स्विट्जरलैंड जैसे देशों ने इसे क्षेत्रीय शांति के लिए सकारात्मक कदम बताया है। अमेरिका के भीतर भी इस समझौते को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कुछ पूर्व अधिकारी और विशेषज्ञ इसे 2015 के परमाणु समझौते जैसा बता रहे हैं, जबकि समर्थकों का कहना है कि इससे युद्ध की आशंका कम होगी और क्षेत्र में स्थिरता आएगी। फिलहाल दुनिया की निगाहें जेनेवा में होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर और उसके बाद जारी होने वाले अंतिम दस्तावेज पर टिकी हुई हैं।

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