UGC पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नए बिल पर लगी रोक, अदालत ने कहा- प्रावधान स्पष्ट नहीं, दुरुपयोग की आशंका

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सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। कोर्ट ने प्रावधानों को अस्पष्ट बताते हुए दुरुपयोग की आशंका जताई और केंद्र व UGC से जवाब मांगा। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने साफ कहा कि नियमों के कई प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की, जिनमें आरोप लगाया गया है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव को बढ़ावा देते हैं।


UGC ने 13 जनवरी को इन नियमों को नोटिफाई किया था, जिसके बाद देश के कई हिस्सों में इसका विरोध शुरू हो गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियमों की भाषा और संरचना ऐसी है, जिससे शिक्षा संस्थानों में अनावश्यक दबाव और असंतुलन पैदा हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।


केंद्र और UGC से जवाब, ड्राफ्ट दोबारा तैयार करने के निर्देश
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी भी रेगुलेशन को लागू करने से पहले उसके दायरे और प्रभाव पूरी तरह स्पष्ट होने चाहिए। बेंच ने UGC को निर्देश दिया कि वह नियमों का ड्राफ्ट दोबारा तैयार करे, ताकि किसी तरह की भ्रम की स्थिति न बने। कोर्ट ने यह भी कहा कि उच्च शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसे प्रावधान नहीं होने चाहिए, जिनसे भय या दबाव का माहौल बने। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक अगला आदेश नहीं आता, तब तक नए नियमों को लागू नहीं किया जाएगा। इस मामले में अगली सुनवाई अब 19 मार्च को तय की गई है। माना जा रहा है कि इस दौरान कोर्ट सरकार और UGC के जवाब के आधार पर आगे की दिशा तय करेगा।


क्या है UGC का नया कानून, जिस पर विवाद
UGC के नए कानून का नाम है ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026’। इसके तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। नियमों में हर संस्थान में विशेष शिकायत निवारण समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें गठित करने का प्रावधान किया गया था। सरकार का तर्क है कि इन बदलावों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। वहीं, जनरल और सवर्ण वर्ग के छात्रों का आरोप है कि नियमों में जातीय भेदभाव की परिभाषा एकतरफा है और इससे कॉलेजों में अराजकता का माहौल बन सकता है। उनका कहना है कि नए नियमों में सवर्ण छात्रों को ‘स्वाभाविक अपराधी’ की तरह देखा गया है, जिससे उनके खिलाफ भेदभाव बढ़ने की आशंका है। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद अब इस पूरे मामले पर सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं।

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