शारदीय नवरात्रि आज से शुरू, 19 से 27 मार्च तक मिलेगा मां के 9 रूपों का आशीर्वाद, व्रत और पूजा विधि से लेकर जानें सबकुछ यहां

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चैत्र नवरात्रि 19 से 27 मार्च तक मनाई जाएगी। इस दौरान घट स्थापना, देवी पूजा और व्रत का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इसका वैज्ञानिक पहलू भी है, जो शरीर और मन दोनों को लाभ पहुंचाता है।

आज से पवित्र चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो गई है, जो 19 मार्च से 27 मार्च तक चलेगी। साल की पहली नवरात्रि होने के कारण इसका खास धार्मिक महत्व माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु विधि-विधान से घट स्थापना करते हैं, जिसके लिए कई शुभ मुहूर्त बताए गए हैं। वसंत ऋतु में आने के कारण इसे वासंती नवरात्र भी कहा जाता है। इन नौ दिनों में लोग देवी की पूजा-अर्चना के साथ व्रत रखते हैं और अपने खानपान व जीवनशैली में संयम लाने की कोशिश करते हैं, जिससे शरीर और मन दोनों को लाभ मिलता है।


क्यों खास है चैत्र नवरात्रि, देवी के नौ रूपों की होती है पूजा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पुराण में साल की दो नवरात्रि को विशेष महत्व दिया गया है—एक चैत्र और दूसरी शारदीय। चैत्र नवरात्रि में हर दिन देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। हालांकि, शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि भक्त चाहें तो पूरे नौ दिन केवल देवी दुर्गा की ही पूजा कर सकते हैं। मार्कंडेय पुराण में नवदुर्गा के नाम और उनके महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। यह परंपरा काफी प्राचीन है और सदियों से चली आ रही है।


घट स्थापना और व्रत का वैज्ञानिक व धार्मिक महत्व

घट स्थापना को पंच तत्वों का प्रतीक माना जाता है, जिसमें मिट्टी का कलश पृथ्वी, जल और वायु का प्रतीक होता है, वहीं दीपक अग्नि तत्व को दर्शाता है। माना जाता है कि इसमें ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा का आवाहन किया जाता है। वहीं व्रत रखने के पीछे सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि वैज्ञानिक कारण भी बताए जाते हैं। इस दौरान हल्का और सीमित भोजन करने से शरीर की कोशिकाएं खुद को रिपेयर करती हैं। इस प्रक्रिया को ऑटोफेजी कहा जाता है, जिस पर शोध के लिए योशिनोरी ओशुमी को 2016 में नोबेल पुरस्कार मिला था। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और व्यक्ति ज्यादा स्वस्थ महसूस करता है।


व्रत के नियम, सिर्फ खानपान नहीं बल्कि सोच और व्यवहार पर भी नियंत्रण

नवरात्रि व्रत में केवल भोजन का संयम ही नहीं, बल्कि मन और व्यवहार पर भी ध्यान दिया जाता है। इसे मानसिक, वाचिक और कायिक व्रत के रूप में समझा जाता है। मानसिक व्रत में नकारात्मक विचारों से दूरी बनाई जाती है, वाचिक व्रत में सच बोलने और दूसरों को आहत न करने पर जोर होता है, जबकि कायिक व्रत में किसी को नुकसान न पहुंचाने की भावना रखी जाती है। इस तरह नवरात्रि सिर्फ पूजा का ही नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने का भी एक अवसर मानी जाती है। 

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