नोएडा में फिर सड़क पर उतरे फैक्ट्री कर्मचारी, न्यूनतम वेतन 26000 करने की मांग, बड़े आंदोलन की चेतावनी

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गौतमबुद्ध नगर में न्यूनतम वेतन को लेकर विवाद बढ़ गया है। श्रमिक संगठनों ने 26 हजार रुपये मासिक वेतन की मांग की है और मौजूदा बढ़ोतरी को नाकाफी बताते हुए आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है।

नोएडा में न्यूनतम वेतन को लेकर श्रमिक संगठनों और प्रशासन के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। महंगाई के बीच सरकार द्वारा घोषित वेतन वृद्धि को श्रमिक संगठन नाकाफी बता रहे हैं। उनका कहना है कि मौजूदा वेतन में परिवार चलाना बेहद मुश्किल हो गया है, इसलिए न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर 26 हजार रुपये प्रतिमाह किया जाना चाहिए। इसी मांग के साथ अब आंदोलन की चेतावनी भी तेज हो गई है, जिससे औद्योगिक क्षेत्र में असंतोष का माहौल बनने लगा है।


‘13 हजार में कैसे चलेगा घर?’ श्रमिकों का सवाल

सीटू समेत कई श्रमिक संगठनों ने सरकार की वेतन वृद्धि पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि तेजी से बढ़ती महंगाई के मुकाबले यह बढ़ोतरी बेहद कम है। श्रमिकों के अनुसार, करीब 13 हजार रुपये की आय में परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना संभव नहीं है। उन्होंने इस बढ़ोतरी को ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ बताते हुए कहा कि इससे मजदूरों की हालत में कोई खास सुधार नहीं होगा।


पुरानी सिफारिशें लागू न होने से बढ़ी नाराजगी

संगठनों का आरोप है कि साल 2020 में एक समिति ने न्यूनतम वेतन 23 हजार रुपये तय करने की सिफारिश की थी, लेकिन अब तक इसे लागू नहीं किया गया। श्रमिक नेताओं का कहना है कि सरकार लगातार इस मुद्दे को टाल रही है। अब मांग की जा रही है कि गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में न्यूनतम वेतन को दिल्ली के बराबर किया जाए, ताकि श्रमिकों को राहत मिल सके।


सरकारी दरों से संतुष्ट नहीं मजदूर, आंदोलन की चेतावनी

सरकार की नई वेतन संरचना के अनुसार अकुशल श्रमिकों को 13,690 रुपये, अर्द्धकुशल को 15,059 रुपये और कुशल श्रमिकों को 16,864 रुपये प्रतिमाह देने का प्रावधान है। श्रमिक संगठनों का कहना है कि यह बढ़ोतरी महंगाई के हिसाब से बहुत कम है। साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलन को दबाने के लिए प्रशासन सख्ती कर रहा है और कुछ नेताओं को नजरबंद किया गया है।


बातचीत नहीं हुई तो तेज होगा आंदोलन

श्रमिक संगठनों ने साफ कर दिया है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया और वार्ता शुरू नहीं हुई, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने लेबर कोड्स वापस लेने, ठेका प्रथा पर रोक लगाने और कच्चे कर्मचारियों को स्थायी करने की मांग भी दोहराई है। फिलहाल, इस पूरे मुद्दे को लेकर प्रशासन और श्रमिक संगठनों के बीच टकराव बढ़ता नजर आ रहा है।

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