युवराज मेहता की मौत के 3 अधिकारी जिम्मेदार, ARO और RSI समेत तीन सस्पेंड, SIT ने मानी कंट्रोल रूम की लापरवाही

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नोएडा के सेक्टर-150 इंजीनियर मौत केस में SIT रिपोर्ट ने पुलिस कंट्रोल रूम की लापरवाही उजागर की, तीन पुलिसकर्मी सस्पेंड किए गए।

नोएडा के सेक्टर-150 में इंजीनियर युवराज मेहता की मौत के करीब 100 दिन बाद एसआईटी जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में साफ तौर पर पुलिस कंट्रोल रूम स्तर पर गंभीर लापरवाही को इस हादसे का प्रमुख कारण माना गया है। जांच में एआरओ और आरएसआई समेत तीन पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया है, जिन्हें निलंबित कर विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इस घटना ने एक बार फिर सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


समय पर मदद नहीं पहुंची, कंट्रोल रूम पर सवाल

एसआईटी रिपोर्ट के मुताबिक, हादसे वाली रात पुलिस कंट्रोल रूम को समय रहते सूचना मिल गई थी, लेकिन उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। तत्काल रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने के बजाय सूचना को औपचारिक रूप से थाने तक सीमित रखा गया। इसके चलते मौके पर राहत कार्य शुरू होने में देरी हुई। जांच में यह भी सामने आया कि पुलिस, एसडीआरएफ और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय बेहद कमजोर रहा, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।


रिकॉर्ड से खुली लापरवाही की परतें

एसआईटी ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड, कंट्रोल रूम की लॉग बुक, वायरलेस मैसेज और फील्ड यूनिट्स की मूवमेंट रिपोर्ट का विश्लेषण किया। इन दस्तावेजों से यह स्पष्ट हुआ कि किस स्तर पर सूचना मिलने के बावजूद कार्रवाई में देरी हुई। इसी आधार पर एआरओ ऐशपाल सिंह, आरएसआई देवेंद्र शर्मा समेत तीन कर्मियों को जिम्मेदार ठहराया गया। अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद ने भी पुष्टि की कि रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की गई है।


घटना की रात क्या हुआ था

16 जनवरी की रात 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता एक निर्माणाधीन साइट पर पानी से भरे गड्ढे में फंस गए थे। वह अपनी कार की छत पर चढ़कर करीब 90 मिनट तक मोबाइल की टॉर्च से मदद के संकेत देते रहे, लेकिन समय पर सहायता नहीं मिल सकी। मौके पर मौजूद उनके पिता ने भी कई बार मदद की गुहार लगाई, लेकिन रेस्क्यू ऑपरेशन में देरी होती रही। अंततः वह पानी में डूब गए और अगले दिन सुबह उनका शव बरामद किया गया।


सिस्टम फेल्योर पर उठे सवाल

एसआईटी रिपोर्ट में इस घटना को महज हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम फेल्योर बताया गया है। स्थानीय लोगों और परिजनों का कहना है कि निर्माणाधीन स्थल पर सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। न तो चेतावनी बोर्ड लगाया गया था और न ही रोशनी की व्यवस्था थी। प्राधिकरण और ट्रैफिक विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, हालांकि अभी तक उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

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