छात्रा पर NSA लगाने के मामले में नोएडा DM को हाईकोर्ट की फटकार, 5 लाख मुआवजे के आदेश के खिलाफ SC में अपील
- Shiv Kumar
- 13 Sep, 2026
गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत को गैरकानूनी ठहराया गया था। हाई कोर्ट ने आकृति को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था और यह राशि जिलाधिकारी समेत हिरासत की कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया था। अदालत ने संबंधित अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में अपनी नाराजगी दर्ज करने को भी कहा था। अब डीएम मेधा रूपम ने अपने खिलाफ दिए गए इन निर्देशों को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है।
मजदूरों के प्रदर्शन के बाद हुई थी आकृति की गिरफ्तारी
यह मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़ा है। मजदूर वेतन बढ़ाने और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। आकृति चौधरी को इसी आंदोलन से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद 13 मई को उनके खिलाफ एनएसए के तहत कार्रवाई की गई। सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार सत्य वर्मा पर भी इसी अवधि में एनएसए लगाया गया था। आकृति की हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी। सुनवाई के बाद 2 सितंबर को न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने उनकी हिरासत रद्द कर दी।
हाई कोर्ट ने हिरासत की कार्रवाई पर उठाए थे गंभीर सवाल
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिरासत के आधार और प्रशासन की ओर से पेश सामग्री की विस्तार से समीक्षा की। अदालत ने कहा कि हिरासत का आदेश पर्याप्त सामग्री और उचित विचार के आधार पर नहीं बनाया गया था। पीठ ने कार्रवाई को लेकर प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि आकृति की हिरासत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट के मुताबिक, मामले में तैयार की गई कहानी में गंभीर विसंगतियां थीं और हिरासत के लिए पेश किए गए आधार पर्याप्त नहीं थे। अदालत ने आकृति को पांच लाख रुपये मुआवजा देने के साथ इसे संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया।
डीएम के सेवा रिकॉर्ड में दर्ज होगी नाराजगी
हाई कोर्ट ने केवल मुआवजे तक ही मामला सीमित नहीं रखा। अदालत ने निर्देश दिया कि जिलाधिकारी और मामले की फाइल तैयार करने में शामिल पुलिस अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज की जाए। अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि यदि नौकरशाही का ऐसा मनमाना और दमनकारी रवैया जारी रहा तो उत्तर प्रदेश को 'ऑरवेलियन डिस्टोपिया' की स्थिति की ओर ले जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों की निष्ठा राजनीतिक कार्यपालिका के बजाय संविधान के प्रति होनी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट में होगी हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती
हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती की तैयारी शुरू हो गई थी। 9 सितंबर को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की जाएगी। अब डीएम मेधा रूपम ने भी अपने खिलाफ मुआवजे की वसूली और सेवा रिकॉर्ड में नाराजगी दर्ज करने से जुड़े निर्देशों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी याचिका में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है और शीर्ष अदालत में इस मामले पर जल्द सुनवाई की संभावना है।
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