नोएडा में प्रदूषण के नए नियम 2026: GRAP, PUC, जानिए पुरानी गाड़ियां और निर्माण-धूल पर क्या बदलेगा
- Shiv Kumar
- 29 Oct, 2026
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में सर्दियों के दौरान बढ़ने वाले वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए 2026 में वाहन, उद्योग, निर्माण कार्य और सड़क की धूल को लेकर कई कदम उठाए गए हैं। केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के प्रदूषण से निपटने के लिए मिलकर काम करने पर जोर दिया है। 18 सितंबर 2026 को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बैठक में उत्तर प्रदेश के एनसीआर से जुड़े आठ जिलों की वायु गुणवत्ता सुधारने के उपायों की समीक्षा हुई। इसके बाद 23 अक्टूबर को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के सचिव ने उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय निकायों की तैयारियों की समीक्षा की। इन प्रयासों में पुराने वाहनों पर कार्रवाई, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, प्रदूषण जांच प्रमाणपत्र यानी PUC, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण-धूल और कचरा प्रबंधन शामिल हैं। इसी दौरान वायु गुणवत्ता बिगड़ने पर लागू होने वाली ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि 2026 में सभी पुराने वाहनों पर एक साथ नया प्रतिबंध लगा दिया गया है या हर निर्माण स्थल पर हमेशा काम बंद रहेगा। कई पाबंदियां वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI), वाहन के ईंधन और उत्सर्जन मानक तथा संबंधित सरकारी आदेशों पर निर्भर करती हैं। नोएडा के वाहन मालिकों, बिल्डरों, ठेकेदारों और आम लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन-से नियम पहले से लागू हैं, 2026 में किन व्यवस्थाओं को मजबूत किया गया है और किन परिस्थितियों में अतिरिक्त पाबंदियां लग सकती हैं।
एनसीआर प्रदूषण पर ताजा बैठक: नोएडा समेत आठ जिलों के लिए क्या तय हुआ
18 सितंबर 2026 को केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच हुई बैठक में एनसीआर से जुड़े उत्तर प्रदेश के आठ जिलों में प्रदूषण कम करने की योजनाओं की समीक्षा की गई। इसमें नोएडा और गाजियाबाद के साथ हापुड़, मेरठ और बुलंदशहर जैसे जिले भी शामिल हैं। बैठक में वाहन प्रदूषण, पुराने वाहनों पर कार्रवाई, इलेक्ट्रिक वाहन नीति, ई-बसों, PUC प्रमाणपत्र, एग्रीगेटर वाहनों और औद्योगिक उत्सर्जन पर चर्चा हुई। सड़क की धूल कम करने के लिए मशीनी सफाई और गहरी सफाई की योजना पर भी जोर दिया गया। इसके साथ ठोस कचरा और निर्माण व तोड़फोड़ से निकलने वाले मलबे के नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत बताई गई। 23 अक्टूबर को मंत्रालय के सचिव ने भी राज्य और स्थानीय निकायों की तैयारियों की समीक्षा की। इन बैठकों का उद्देश्य विभिन्न विभागों के बीच तालमेल बढ़ाना और प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को समयबद्ध तरीके से लागू करना है। हालांकि, बैठक में चर्चा होना और किसी नियम का औपचारिक रूप से लागू होना अलग बातें हैं।
मुख्यमंत्री और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री की बैठक की मुख्य बातें
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की बैठक में प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों पर एक साथ काम करने पर जोर दिया गया। इसमें वाहनों से निकलने वाले धुएं को कम करना, पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना शामिल रहा। अधिकारियों ने बताया कि करीब 80 प्रतिशत उद्योगों में ऑनलाइन सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (OCEMS) और वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरण लगाए जा चुके थे। बाकी इकाइयों में भी व्यवस्था पूरी करने पर काम किया जा रहा था। बैठक में सड़क की धूल, निर्माण मलबे और ठोस कचरे के प्रबंधन पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा पड़ोसी राज्यों के साथ तालमेल और पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण को रोकने के प्रयासों पर ध्यान दिया गया। इन फैसलों का उद्देश्य केवल नोएडा में नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर में हवा की गुणवत्ता सुधारना है। किसी खास वाहन या निर्माण परियोजना पर लागू प्रतिबंध के लिए संबंधित विभाग का आधिकारिक आदेश देखना जरूरी है।
वाहन, उद्योग, धूल और कचरा प्रबंधन पर फोकस
2026 में प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति में चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया है। पहला, वाहन प्रदूषण कम करने के लिए स्वच्छ ईंधन, इलेक्ट्रिक वाहनों और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना। दूसरा, उद्योगों में उत्सर्जन की निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों का इस्तेमाल सुनिश्चित करना। तीसरा, सड़कों की मशीनी सफाई, धूल दबाने और निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के उपाय लागू करना। चौथा, घरेलू कचरे और निर्माण-तोड़फोड़ से निकलने वाले मलबे को खुले में फेंकने या जलाने से रोकना। इन क्षेत्रों में जिम्मेदारी अलग-अलग विभागों, स्थानीय निकायों, औद्योगिक इकाइयों और परियोजना संचालकों की होती है। नोएडा में प्रदूषण कम करने के लिए केवल वाहनों पर चालान करना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि सड़क की धूल और निर्माण गतिविधियां भी हवा की गुणवत्ता प्रभावित करती हैं। इसी तरह, उद्योगों में निगरानी उपकरण लगाना तभी उपयोगी होगा, जब उनका संचालन और नियमों का पालन नियमित रूप से जांचा जाए। इसलिए नई रणनीति में निगरानी, कार्रवाई और विभागों के बीच तालमेल तीनों महत्वपूर्ण हैं।
GRAP क्या है और इसके चरण कैसे काम करते हैं
GRAP यानी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान दिल्ली-एनसीआर में हवा की गुणवत्ता खराब होने पर लागू किए जाने वाले चरणबद्ध उपायों की व्यवस्था है। इसका मकसद प्रदूषण गंभीर होने से पहले और उसके बढ़ने पर अलग-अलग स्तरों पर कार्रवाई करना है। वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी AQI के साथ प्रदूषण के पूर्वानुमान को भी ध्यान में रखा जाता है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) संबंधित परिस्थितियों की समीक्षा करके चरण लागू करने या हटाने के आदेश जारी करता है। GRAP के चार चरण हैं—खराब, बहुत खराब, गंभीर और अत्यंत गंभीर। हर चरण में कुछ अतिरिक्त पाबंदियां और नियंत्रण उपाय लागू हो सकते हैं। इनमें सड़क की सफाई, धूल नियंत्रण, डीजल जनरेटर के इस्तेमाल पर नियम, वाहनों की आवाजाही और निर्माण गतिविधियों पर रोक जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। यह समझना जरूरी है कि सभी पाबंदियां हर समय लागू नहीं रहतीं। नोएडा में किसी दिन कौन-सा चरण प्रभावी है, इसकी पुष्टि CAQM के ताजा आदेश से करनी चाहिए, क्योंकि स्थिति के अनुसार नियम बदल सकते हैं।
स्टेज 1 से स्टेज 4: कब कौन-सी पाबंदी लगती है
GRAP के पहले चरण में AQI 201 से 300 यानी खराब श्रेणी में होने पर धूल नियंत्रण, मशीनी सड़क सफाई, कचरे का नियमित उठान और खुले में कचरा जलाने पर रोक जैसे उपाय लागू होते हैं। दूसरे चरण में AQI 301 से 400 यानी बहुत खराब होने पर उपाय और सख्त किए जाते हैं। इसमें डीजल जनरेटर पर नियंत्रण और निजी वाहनों के इस्तेमाल को कम करने के कदम शामिल हो सकते हैं। तीसरे चरण में AQI 401 से 450 यानी गंभीर श्रेणी में पहुंचने पर कुछ श्रेणियों के पुराने उत्सर्जन मानक वाले वाहनों और निर्माण गतिविधियों पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। चौथे चरण में AQI 450 से ऊपर यानी अत्यंत गंभीर स्थिति में और कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। इनमें कुछ भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक और शैक्षणिक गतिविधियों के लिए विशेष निर्देश शामिल हो सकते हैं। वास्तविक प्रतिबंध लागू आदेश और अपवादों पर निर्भर करते हैं। इसलिए वाहन चलाने या निर्माण कार्य जारी रखने से पहले उस दिन का आधिकारिक GRAP आदेश देखना जरूरी है।
नोएडा-ग्रेटर नोएडा में GRAP का असर
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में GRAP लागू होने पर वाहन मालिकों, निर्माण कंपनियों, औद्योगिक इकाइयों, स्कूलों और स्थानीय निकायों पर अलग-अलग तरह के निर्देश लागू हो सकते हैं। पहले चरण में सड़कों की मशीनी सफाई, पानी का छिड़काव और निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण बढ़ाया जाता है। प्रदूषण और बिगड़ने पर डीजल जनरेटर के इस्तेमाल, कुछ वाहनों की आवाजाही और निर्माण गतिविधियों पर सख्ती बढ़ सकती है। गंभीर स्तर पर कुछ श्रेणियों के वाहन प्रतिबंधित हो सकते हैं और धूल पैदा करने वाले निर्माण कार्य रोकने के आदेश दिए जा सकते हैं। इन निर्देशों का पालन केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है; बिल्डरों, सोसाइटियों, दुकानदारों और वाहन मालिकों को भी लागू नियमों का पालन करना होता है। किसी पाबंदी का उल्लंघन करने पर संबंधित कानून या आदेश के तहत कार्रवाई हो सकती है। यह भी ध्यान रखें कि दिल्ली में लागू हर स्थानीय निर्देश अपने आप नोएडा में उसी तरह लागू नहीं होता। नोएडा के लिए CAQM, उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित प्राधिकरण के आदेश देखना जरूरी है।
वाहन प्रदूषण से जुड़े नियम
वाहनों से निकलने वाला धुआं एनसीआर में वायु प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसलिए वाहन मालिकों को अपनी गाड़ी का उत्सर्जन मानक, फिटनेस और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यानी PUC की वैधता जांचते रहना चाहिए। समय पर सर्विस कराने, खराब इंजन की मरम्मत और निर्धारित ईंधन का इस्तेमाल करने से अनावश्यक उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है। प्रदूषण बढ़ने पर GRAP के तहत कुछ श्रेणियों के वाहनों की आवाजाही पर अतिरिक्त रोक लग सकती है। ऐसे प्रतिबंध वाहन के ईंधन, BS मानक, पंजीकरण और लागू आदेश के अनुसार तय होते हैं। नोएडा में वाहन चलाने वालों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सभी निजी गाड़ियों पर एक जैसे नियम लागू होंगे। खासकर पुराने डीजल और पेट्रोल वाहनों के मामले में उम्र संबंधी प्रतिबंध और प्रदूषण नियंत्रण के आदेश अलग-अलग हो सकते हैं। वाहन खरीदने, दूसरे जिले से लाने या सड़क पर चलाने से पहले परिवहन विभाग के मौजूदा निर्देश देखना बेहतर है। वैध PUC होने का अर्थ यह भी नहीं कि वाहन किसी अलग प्रतिबंध से मुक्त हो गया है।
पुरानी गाड़ियां और ईवी नीति
एनसीआर में पुराने वाहनों को लेकर पहले से लागू कानूनी प्रतिबंध महत्वपूर्ण हैं। सुप्रीम कोर्ट के 29 अक्टूबर 2018 के आदेश के अनुसार, एनसीआर में 10 साल से पुराने डीजल और 15 साल से पुराने पेट्रोल वाहनों के चलने पर रोक संबंधी निर्देश लागू हैं। इसलिए 2026 की प्रदूषण नीति को सभी पुराने वाहनों पर पहली बार लगाया गया नया प्रतिबंध समझना सही नहीं होगा। किसी वाहन की उम्र, ईंधन, पंजीकरण और संबंधित न्यायिक आदेश के आधार पर उसकी स्थिति जांचनी चाहिए। इसके साथ उत्तर प्रदेश सरकार की इलेक्ट्रिक वाहन नीति और सार्वजनिक परिवहन को स्वच्छ बनाने के प्रयासों पर भी जोर दिया जा रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों से सड़क पर चलने के दौरान टेलपाइप उत्सर्जन नहीं होता, हालांकि उनकी कुल पर्यावरणीय लागत बिजली उत्पादन और बैटरी निर्माण जैसे कारकों पर भी निर्भर करती है। पुरानी गाड़ी बदलने या इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने से पहले सरकारी सब्सिडी, पंजीकरण और पात्रता की मौजूदा शर्तें जांच लें। केवल वाहन की उम्र देखकर हर परिस्थिति में एक जैसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
PUC सर्टिफिकेट: अनिवार्यता और जुर्माना
PUC यानी प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यह बताता है कि वाहन की जांच में उसका उत्सर्जन निर्धारित मानकों के अनुरूप पाया गया या नहीं। वाहन मालिकों को प्रमाणपत्र की वैधता समाप्त होने से पहले जांच करानी चाहिए और प्रमाणपत्र अपने पास रखना चाहिए। 2026 में CAQM ने NCR में वैध PUC प्रमाणपत्र के बिना वाहनों को ईंधन देने पर रोक लागू करने संबंधी निर्देश भी जारी किया। इसका मतलब है कि प्रमाणपत्र समाप्त होने पर केवल चालान का ही नहीं, पेट्रोल पंप पर ईंधन मिलने में परेशानी का भी जोखिम हो सकता है। मोटर वाहन कानून के तहत प्रदूषण प्रमाणपत्र या संबंधित उल्लंघन पर लागू दंड की स्थिति अपराध और प्रावधान के अनुसार जांचनी चाहिए; हर मामले में एक ही जुर्माना बताना सही नहीं होगा। वाहन की जांच अधिकृत केंद्र से कराएं और प्रमाणपत्र में दर्ज वाहन नंबर तथा वैधता की तारीख मिलाएं। यदि वाहन जांच में तय मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो उसकी मरम्मत कराकर दोबारा जांच करानी चाहिए। वैध PUC होने के बावजूद GRAP के तहत लागू अलग वाहन प्रतिबंधों का पालन करना जरूरी है।
ई-बस और एग्रीगेटर वाहन
प्रदूषण कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन और व्यावसायिक वाहन सेवाओं को स्वच्छ विकल्पों की ओर ले जाने पर जोर दिया जा रहा है। सितंबर 2026 की समीक्षा बैठक में इलेक्ट्रिक बसों, एग्रीगेटर वाहनों और डिलीवरी सेवाओं से जुड़े उपायों पर चर्चा हुई। एग्रीगेटर वे कंपनियां हैं जो ऐप के जरिए टैक्सी या दूसरी वाहन सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। CAQM के निर्देशों में एग्रीगेटर, डिलीवरी सेवा प्रदाताओं और ई-कॉमर्स कंपनियों के वाहनों को स्वच्छ बनाने के लिए चरणबद्ध व्यवस्था शामिल है। इसके अलावा NCR में नए पंजीकरण वाले यात्री और माल ढोने वाले तीनपहिया वाहनों को इलेक्ट्रिक बनाने के लिए 2026 में निर्देश जारी किया गया। डीजल ऑटो को चरणबद्ध तरीके से हटाने का लक्ष्य भी तय किया गया है। इन निर्देशों का सटीक दायरा वाहन की श्रेणी, पंजीकरण की तारीख और लागू आदेश पर निर्भर करता है। इसलिए सभी मौजूदा टैक्सी या डिलीवरी वाहनों पर एक ही समय में पूर्ण प्रतिबंध मान लेना सही नहीं होगा। वाहन संचालकों को CAQM और परिवहन विभाग के निर्देश देखने चाहिए।
निर्माण और धूल प्रदूषण के नियम
निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल हवा में PM10 और PM2.5 जैसे प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकती है। इसे नियंत्रित करने के लिए NCR में निर्माण और तोड़फोड़ वाली जगहों पर धूल रोकने के उपायों को मजबूत किया गया है। परियोजना के आकार और लागू निर्देशों के अनुसार साइट को धूल निगरानी पोर्टल पर दर्ज करना, निर्माण सामग्री को ढककर रखना, धूल उड़ने से रोकने के लिए पानी का छिड़काव करना और मलबे को सुरक्षित तरीके से हटाना जरूरी हो सकता है। निर्माण सामग्री को खुले ट्रक में ढोने या सड़क पर मलबा छोड़ने से भी धूल फैलती है। CAQM ने फरवरी 2026 में निर्माण और तोड़फोड़ से निकलने वाले मलबे के प्रबंधन के लिए नए निर्देश जारी किए, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू होने थे। प्रदूषण के गंभीर स्तर पर GRAP के तहत कुछ निर्माण गतिविधियों पर रोक भी लग सकती है। बिल्डरों और ठेकेदारों को परियोजना शुरू करने से पहले लागू नियमों और आवश्यक अनुमतियों की जांच करनी चाहिए।
कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन (C&D) वेस्ट नियम
C&D वेस्ट का मतलब निर्माण, मरम्मत और इमारतों को तोड़ने से निकलने वाला मलबा है। इसमें ईंट, कंक्रीट, सीमेंट, पत्थर और दूसरी निर्माण सामग्री शामिल होती है। इसे सड़क किनारे, खाली प्लॉट या नाले में डालने से धूल और जल निकासी की समस्या बढ़ सकती है। CAQM के 20 फरवरी 2026 के निर्देशों के अनुसार, NCR के संबंधित स्थानीय निकायों और विकास प्राधिकरणों को निर्माण मलबे के संग्रह, अस्थायी भंडारण और प्रसंस्करण की व्यवस्था मजबूत करनी है। निर्देशों में 5 किलोमीटर गुणा 5 किलोमीटर के क्षेत्र में कम से कम एक संग्रह केंद्र की व्यवस्था का लक्ष्य भी शामिल है। जिन परियोजनाओं में 200 वर्ग मीटर या उससे अधिक के प्लॉट पर निर्माण से पहले तोड़फोड़ जरूरी है, वहां मलबे की अनुमानित मात्रा और उसके अधिकृत निस्तारण से जुड़े प्रावधान लागू होते हैं। संबंधित परियोजनाओं के पूर्णता या अधिभोग प्रमाणपत्र से पहले मलबा जमा करने की रसीद की जांच भी जरूरी हो सकती है। बिल्डरों को मलबा अधिकृत केंद्र तक पहुंचाकर रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए।
सड़कों की मशीनी सफाई
सड़क पर जमा मिट्टी और धूल वाहनों के गुजरने से दोबारा हवा में फैल सकती है। इस समस्या को कम करने के लिए CAQM ने 2026 में मशीनी सड़क सफाई मशीनों के इस्तेमाल के तकनीकी और परिचालन मानक तय किए। इन निर्देशों में सड़क की चौड़ाई के अनुसार उपयुक्त मशीन चुनने, सफाई की क्षमता और कवरेज को व्यवस्थित करने तथा सड़क संभालने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी तय करने पर जोर दिया गया है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्राधिकरणों तथा संबंधित सड़क एजेंसियों को धूल वाले हिस्सों की पहचान कर नियमित सफाई और जरूरत के अनुसार पानी के छिड़काव जैसे उपाय करने चाहिए। केवल सड़क पर पानी डालना पर्याप्त नहीं है; जमा मिट्टी और मलबे को भी हटाना जरूरी है। सफाई के दौरान उठी धूल को नियंत्रित करने और एकत्र कचरे का उचित निस्तारण करने पर भी ध्यान देना चाहिए। GRAP के पहले चरण में भी मशीनी सफाई और धूल नियंत्रण जैसे उपाय शामिल हैं। इन व्यवस्थाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब मशीनें नियमित चलें और उनकी निगरानी की जाए।
आम लोगों और सोसाइटियों को क्या करना चाहिए
नोएडा के निवासियों को प्रदूषण कम करने के लिए अपने स्तर पर भी सावधानी बरतनी चाहिए। वाहन का PUC प्रमाणपत्र वैध रखें, छोटी दूरी के लिए पैदल चलने या साइकिल का विकल्प अपनाएं और संभव हो तो सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें। सोसाइटी में पत्तियां, प्लास्टिक या घरेलू कचरा खुले में न जलाएं। निर्माण या मरम्मत का काम कराते समय ठेकेदार से धूल नियंत्रण, सामग्री को ढकने और मलबा अधिकृत जगह पर पहुंचाने की व्यवस्था सुनिश्चित कराएं। प्रदूषण बढ़ने पर GRAP के आदेश देखें, क्योंकि वाहन चलाने, निर्माण कार्य और जनरेटर के इस्तेमाल पर अतिरिक्त पाबंदियां लग सकती हैं। घर के बाहर जमा मिट्टी को सूखे तरीके से झाड़ने के बजाय ऐसी सफाई अपनाएं जिससे धूल कम उड़े। बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी परेशानी वाले लोगों को प्रदूषण अधिक होने पर बाहरी गतिविधियां सीमित करने की सलाह दी जा सकती है। AQI और स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों के लिए आधिकारिक सरकारी स्रोतों पर भरोसा करें। नियमों का पालन करने से प्रदूषण नियंत्रण के सामूहिक प्रयासों को मदद मिलती है।
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