शिवसेना UBT के बागी सांसद और ‘ऑपरेशन टाइगर’ से महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल
- Babli Ansari
- 16 Jun, 2026
नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर खेमों के बीच खींचतान तेज हो गई है। शिवसेना UBT के एक सांसद के रुख ने सियासी हलचल बढ़ा दी है और सत्ता-पक्ष के भीतर बैठी रणनीति अब खुलकर सामने आने लगी है। ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम से चल रही इस कवायद ने मराठी राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है, जहां पुराने वफादारों को साधने और नाराज नेताओं को तोड़ने की कोशिशें साथ-साथ चल रही हैं। दिल्ली से मुंबई तक नेताओं की निगाह इस एक सीट और एक फैसले पर टिकी है, क्योंकि इसका असर सिर्फ दल-बदल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गठजोड़ की ताकत और आने वाले समीकरणों पर भी पड़ेगा।
बागी सांसद को लेकर बढ़ी सियासी गहमागहमी
सूत्रों के मुताबिक, जिस सांसद को लेकर हलचल है, उनके कदम पर शिवसेना UBT खेमे में चिंता साफ दिख रही है। बताया जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व लगातार संपर्क में है, जबकि विरोधी खेमा उन्हें अपने पाले में बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। महाराष्ट्र में ऐसे मौकों पर सियासत अक्सर बेहद तेज हो जाती है, क्योंकि एक चेहरा बदलते ही लोकसभा और विधानसभा, दोनों स्तर पर संदेश जाता है। यही वजह है कि इस मामले को सिर्फ व्यक्तिगत असंतोष नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत की तरह देखा जा रहा है। कई नेताओं का मानना है कि अगर यह पाला बदलता है तो बाकी असंतुष्टों पर भी असर पड़ेगा।
‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम खुद बताता है कि दांव कितना बड़ा है। यह केवल एक सांसद तक सीमित कोशिश नहीं मानी जा रही, बल्कि व्यापक राजनीतिक पुनर्संयोजन का हिस्सा मानी जा रही है। जानकारी के अनुसार, महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना, शिंदे गुट, बीजेपी और विपक्षी गठबंधनों के बीच भरोसे का संकट पहले से मौजूद है। ऐसे में किसी भी बागी या असंतुष्ट नेता की चाल पूरे समीकरण को हिला सकती है। पार्टी सूत्र कह रहे हैं कि फिलहाल हर बयान और हर मुलाकात पर नजर रखी जा रही है, ताकि कोई आखिरी वक्त पर दगा न दे सके।
महाराष्ट्र की सत्ता-समीकरण पर क्यों पड़ सकता है असर
महाराष्ट्र में शिवसेना की पहचान हमेशा संगठन, जमीन और वफादारी से जोड़ी गई है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के बंटवारे ने इस पहचान को गहरी चोट पहुंचाई है। अब जब फिर से एक सांसद को लेकर खेमेबंदी की खबरें सामने हैं, तो पुराना विवाद नए रूप में लौट आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के मामलों में प्रतीकात्मक असर बहुत बड़ा होता है। एक तरफ समर्थकों को संदेश जाता है कि नेतृत्व कमजोर नहीं है, वहीं दूसरी तरफ प्रतिद्वंद्वी दल यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि दरार अभी भी खुली है।
इसी बीच, हाल के कुछ घटनाक्रमों ने भी कयासों को हवा दी है। अलग-अलग मराठी और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में यह संकेत मिला है कि सत्ताधारी और विरोधी, दोनों खेमे अपने-अपने विधायकों और सांसदों को एकजुट रखने में जुटे हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह हलचल सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है या सचमुच किसी बड़े राजनीतिक मोड़ की तैयारी चल रही है। फिलहाल इतना साफ है कि महाराष्ट्र की सियासत एक बार फिर अस्थिर मोड़ पर खड़ी है और अगले कुछ घंटे या दिन कई नेताओं की दिशा तय कर सकते हैं।
आगे क्या, इस पर टिकी हैं सबकी निगाहें
अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन सियासी गलियारों में बेचैनी बढ़ गई है। शिवसेना UBT खेमे के लिए यह सिर्फ एक सांसद का मसला नहीं, बल्कि संगठनात्मक पकड़ की परीक्षा है। दूसरी तरफ, जिन दलों पर ‘ऑपरेशन टाइगर’ का शक जताया जा रहा है, वे खुलकर कुछ कहने से बच रहे हैं। यही चुप्पी अटकलों को और हवा दे रही है। जो नेता अभी तक खामोश हैं, उनके अगले बयान से स्थिति का रुख तय हो सकता है।
फिलहाल यह साफ है कि महाराष्ट्र में सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ से जोड़-तोड़ की राजनीति जारी है। अगर बागी सांसद का रुख बदलता है, तो इसका असर सिर्फ एक सीट पर नहीं, बल्कि आने वाले लोकसभा और विधानसभा गणित पर भी पड़ सकता है। जिन खेमों ने अभी तक अपनी लाइनें साफ नहीं की हैं, वे भी शायद इसी वजह से सतर्क हैं। सियासी हलकों में अब बस एक ही सवाल घूम रहा है—क्या यह हलचल दब जाएगी या महाराष्ट्र में एक और बड़ा राजनीतिक झटका आने वाला है।
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