एकनाथ शिंदे और संजय राउत के बीच तीखी जुबानी जंग, शिवसेना की अंदरूनी लड़ाई फिर तेज
- Babli Ansari
- 20 Jun, 2026
मुंबई। महाराष्ट्र की सियासत में शिवसेना के दोनों धड़ों के बीच टकराव एक बार फिर खुले मंच पर आ गया है। उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के “यह तो बस ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है” वाले बयान पर शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने कड़ा पलटवार किया है। राउत की टिप्पणी के बाद शिंदे गुट और उद्धव खेमे के बीच बयानबाज़ी और तेज हो गई है। यह वही खींचतान है, जो पार्टी के विभाजन के बाद से लगातार जारी है और अब फिर से संगठन, सांसदों की निष्ठा और भविष्य की रणनीति पर सवाल खड़े कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, हालिया बयान ऐसे समय आए हैं जब शिवसेना के भीतर गुटबाजी को लेकर नई अटकलें भी तैर रही हैं।
शिंदे के बयान से भड़की नई सियासी लपट
जानकारी के मुताबिक, शिंदे ने अपने हालिया संबोधन में अपने राजनीतिक दावे को और आक्रामक अंदाज़ में पेश किया। उनके “पिक्चर अभी बाकी है” वाले वाक्य ने विरोधी खेमे को जवाब देने का नया मौका दे दिया। संजय राउत ने इसी पर पलटवार करते हुए शिंदे खेमे पर सीधा हमला बोला और तंज भरे शब्दों में उनकी राजनीति को चुनौती दी। राउत के बयानों के बाद शिंदे समर्थकों ने भी मोर्चा संभाल लिया और सोशल मीडिया से लेकर टीवी बहसों तक, दोनों तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगीं। मुंबई के राजनीतिक गलियारों में इसे सिर्फ बयान नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन के नए दौर के रूप में देखा जा रहा है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह जुबानी जंग केवल एक-दूसरे पर कटाक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे संगठन पर नियंत्रण, जनप्रतिनिधियों की निष्ठा और आगामी राजनीतिक समीकरणों की लड़ाई भी चल रही है। शिंदे खेमे का दावा है कि उनके पास अब भी राजनीतिक धार और जनाधार है, जबकि उद्धव ठाकरे गुट इसे संगठन को कमजोर करने की कोशिश बता रहा है। इसी टकराव ने शिवसेना के पुराने कैडर को भी दो खेमों में बांट दिया है। बयानबाज़ी का यह सिलसिला बताता है कि 2022 की टूटन के बाद पार्टी का विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि हर बड़े राजनीतिक मौके पर फिर सिर उठा लेता है।
संगठन की लड़ाई से बढ़ी अटकलें
शिवसेना के दोनों धड़ों के बीच यह रस्साकशी अब सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं मानी जा रही। दिल्ली की सियासत भी इसे बारीकी से देख रही है, क्योंकि शिवसेना की पहचान, उसके सांसदों और विधायकों की स्थिति, और लोकसभा के बाद आने वाले राजनीतिक संदेश पर इसका असर पड़ सकता है। सूत्रों का कहना है कि हाल के दिनों में सांसदों और विधायकों की संभावित आवाजाही को लेकर जो चर्चाएं चलीं, उन्होंने दोनों पक्षों की बेचैनी बढ़ा दी है। इसी वजह से हर बयान अब रणनीतिक महत्व रखता है। शिंदे खेमे के लिए यह अपनी पकड़ दिखाने का मौका है, जबकि राउत और उद्धव गुट इसे भावनात्मक और वैचारिक लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की तल्ख़ी से फिलहाल सुलह की कोई गुंजाइश नहीं दिखती। उलटे, हर तीखा बयान अगले बयान की जमीन तैयार कर रहा है। शिवसेना की जमीनी राजनीति, मुंबई-महाराष्ट्र के स्थानीय समीकरण और मराठी अस्मिता की पुरानी राजनीति भी इस बहस के साथ जुड़ जाती है। आने वाले दिनों में अगर कोई और नेता इस विवाद में उतरता है, तो टकराव और फैल सकता है। फिलहाल साफ है कि शिंदे और राउत की यह भिड़ंत सिर्फ शब्दों की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत की लड़ाई है, जिसे दोनों पक्ष अपने-अपने तरीके से वैध ठहराने में जुटे हैं।
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