ममता के 'महामोर्चा' प्रस्ताव पर विपक्ष ने ही दिखाया आईना, कांग्रेस-लेफ्ट बोले- पहले अपने गिरेबान में झांकिए
ममता बनर्जी के ‘फ्रंट’ वाले आह्वान के बाद बंगाल की सियासत में पुरानी साझेदारियों की याद ताजा हो गई है। विपक्षी खेमे ने कांग्रेस-लेफ्ट गठजोड़ की नाकामी को सामने रखकर तृणमूल सुप्रीमो पर निशाना साधा है।
- Babli Ansari
- 29 Jul, 2026
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भाजपा विरोधी व्यापक विपक्षी मोर्चा बनाने की अपील पर कांग्रेस और वाम दलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। विपक्षी नेताओं ने कहा कि आज जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई है, तब उसे कांग्रेस और वामपंथी दलों की याद आ रही है। कांग्रेस और लेफ्ट नेताओं का आरोप है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के मजबूत होने के पीछे सबसे बड़ी वजह खुद तृणमूल कांग्रेस की राजनीति रही है। इसलिए बिना आत्ममंथन किए विपक्षी एकता की अपील करना उचित नहीं है।
कांग्रेस और वाम दलों ने क्यों उठाए सवाल
विपक्षी दलों का कहना है कि वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस और वाम दलों पर लगातार राजनीतिक हमले किए। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदलने के बाद विपक्षी एकता की बात करना लोगों को स्वीकार नहीं होगा। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यदि भाजपा को रोकना है तो पहले यह स्वीकार करना होगा कि बंगाल की राजनीति में मौजूदा हालात कैसे बने। वहीं वाम दलों ने भी स्पष्ट किया कि केवल सत्ता बदलने के बाद गठबंधन की बात करना पर्याप्त नहीं है।
भाजपा के उभार को लेकर आरोप-प्रत्यारोप
कांग्रेस और लेफ्ट नेताओं ने दावा किया कि राज्य में भाजपा का विस्तार तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लंबे समय तक चले राजनीतिक ध्रुवीकरण का परिणाम है। उनका कहना है कि विपक्षी एकता केवल बयान देने से नहीं बनेगी, बल्कि राजनीतिक भरोसा भी जरूरी है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि भाजपा के खिलाफ सभी लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष दलों को एक मंच पर आना चाहिए। हालांकि विपक्ष ने फिलहाल इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के संकेत नहीं दिए हैं।
बंगाल की राजनीति में बढ़ी नई सियासी बहस
ममता बनर्जी की अपील के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर विपक्षी गठबंधन को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस और वाम दलों का रुख साफ है कि किसी भी संभावित सहयोग से पहले राजनीतिक विश्वास बहाल होना चाहिए। वहीं तृणमूल कांग्रेस लगातार भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी एकजुटता की जरूरत पर जोर दे रही है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि विपक्षी दल अपने पुराने मतभेद भुलाकर साथ आते हैं या बंगाल की राजनीति में अलग-अलग रास्तों पर आगे बढ़ते हैं।
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